
लखनऊ में ‘बॉयकॉट सपा’ के बैनर, अखिलेश के PDA नारे पर सवाल
माजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ 'बॉयकॉट सपा' के बैनर लगने का मामला पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत कई जिलों में अखिलेश यादव के विरोध में पोस्टर और होर्डिंग लगाए जा चुके हैं।

LIVE 24 TV | लखनऊ | 4 नवंबर 2026
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ लगाए गए बहिष्कार के बैनरों ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। इन बैनरों पर 'BOYCOTT AKHILESH YADAV' और 'BOYCOTT SAMAJWADI PARTY' लिखा गया है। स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर अखिलेश यादव की बयानबाजी और सपा के कुछ कार्यकर्ताओं की कथित अभद्र टिप्पणियों से नाराज लोगों ने पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नारे पर सवाल उठाए हैं।
बैनरों के जरिए मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा समाज की नाराजगी सामने रखने की कोशिश की गई है। विरोध करने वालों का आरोप है कि समाजवादी पार्टी चुनाव के समय पिछड़े वर्गों के सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी की बात करती है, लेकिन जब इन्हीं वर्गों के नेताओं के सम्मान का सवाल आता है तो पार्टी का व्यवहार अलग दिखाई देता है।
हालांकि, बैनर लगाने वाले सभी लोगों की पहचान और उनके संगठन की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे पूरे मौर्य या अन्य पिछड़े समाज का सामूहिक रुख नहीं माना जा सकता।
लखनऊ में लगे बैनरों पर क्या लिखा है?
राजधानी के अलग-अलग इलाकों में सामने आए बैनरों में सीधे तौर पर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के बहिष्कार की अपील की गई है।
बैनरों में प्रमुख रूप से तीन संदेश सामने आए हैं:
BOYCOTT AKHILESH YADAV
BOYCOTT SAMAJWADI PARTY
स्वामी प्रसाद मौर्य का अपमान नहीं सहेगा मौर्य समाज।
कुछ पोस्टरों में सोशल मीडिया टिप्पणियों के स्क्रीनशॉट का भी इस्तेमाल किया गया है। इनके जरिए सवाल उठाया गया है कि पिछड़ों और दलितों के अधिकारों की बात करने वाली समाजवादी पार्टी अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार क्यों नहीं कर रही। विरोध से जुड़े संदेशों में यह भी कहा गया है कि पिछड़े समाज को केवल चुनावी समर्थन के लिए नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया और राजनीतिक नेतृत्व में भी उचित सम्मान मिलना चाहिए।
स्वामी प्रसाद मौर्य के मुद्दे पर क्यों बढ़ा विवाद?
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और अखिलेश यादव के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मतभेद हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैर-यादव पिछड़े वर्ग के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। वह पहले बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामा था।
फरवरी 2024 में रामचरितमानस को लेकर उनकी विवादास्पद टिप्पणियों और पार्टी नेतृत्व से मतभेदों के बीच उन्होंने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक राह चुनी और अपनी जनता पार्टी का गठन किया।
हाल के दिनों में कांग्रेस नेताओं के साथ उनकी मुलाकातों और विपक्षी गठबंधन में संभावित भूमिका को लेकर फिर चर्चा शुरू हुई। इसी दौरान अखिलेश यादव और स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच बयानबाजी तेज हो गई।
30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अखिलेश यादव से पूछा गया था कि क्या स्वामी प्रसाद मौर्य और उनकी पार्टी को विपक्षी INDIA गठबंधन में जगह मिलेगी। इस पर अखिलेश यादव ने स्पष्ट किया कि स्वामी प्रसाद मौर्य उनके गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं और उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे में उनके लिए कोई जगह नहीं है।
उन्होंने पत्रकारों से मौर्य को नजरअंदाज करने की बात भी कही। अखिलेश यादव के इस बयान के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य ने तीखी प्रतिक्रिया दी। 1 नवंबर को उन्होंने अखिलेश यादव को PDA का 'दुश्मन नंबर-1' बताया। मौर्य ने सवाल उठाया कि जो पार्टी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के सम्मान का दावा करती है, वह उन्हीं वर्गों से आने वाले नेताओं के प्रति ऐसा रवैया क्यों अपना रही है।
यही नहीं स्वामी प्रसाद मौर्य और अखिलेश यादव के बीच बढ़ती दूरियों का असर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के संबंधों की चर्चा में भी दिखाई दे रहा है। हाल ही में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने स्वामी प्रसाद मौर्य से मुलाकात की थी। इससे पहले मौर्य कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी मिले थे। इन मुलाकातों के बाद मौर्य की विपक्षी गठबंधन में भूमिका को लेकर चर्चा तेज हुई। हालांकि, अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया कि उत्तर प्रदेश में उनके गठबंधन की व्यवस्था में मौर्य के लिए कोई स्थान नहीं है।
दूसरी ओर, राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि किसी राजनीतिक नेता से व्यक्तिगत मुलाकात करने का अर्थ यह नहीं है कि गठबंधन को लेकर कोई निर्णय हो गया है। उन्होंने अखिलेश यादव और स्वामी प्रसाद मौर्य के आपसी विवाद से दूरी बनाने की बात भी कही।

PDA का नारा सिर्फ चुनाव तक?
समाजवादी पार्टी के राजनीतिक अभियान का प्रमुख आधार PDA है, जिसका अर्थ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। अखिलेश यादव इस नारे के माध्यम से सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संवैधानिक अधिकारों की बात करते रहे हैं।
लेकिन लखनऊ में सामने आए विरोध के बाद इस नारे की व्यावहारिक राजनीति को लेकर बहस शुरू हो गई है। विरोध करने वालों का आरोप है कि समाजवादी पार्टी चुनाव के समय पिछड़े वर्गों से समर्थन मांगती है, लेकिन जब समाज के किसी नेता के सम्मान या राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा उठता है, तो पार्टी नेतृत्व अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाता।
उनका सवाल है कि यदि PDA समाजवादी पार्टी की विचारधारा का आधार है, तो पिछड़े समाज के नेताओं के साथ राजनीतिक मतभेद होने पर उनके सम्मान का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, ये विरोध करने वालों के आरोप हैं। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि समाजवादी पार्टी के सभी पिछड़े वर्ग के समर्थक उससे नाराज हैं।
स्वामी प्रसाद मौर्य के अलावा नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद भी अखिलेश यादव की PDA राजनीति की आलोचना कर चुके हैं। 28 सितंबर को चंद्रशेखर आजाद ने समाजवादी पार्टी के PDA नारे को लेकर कहा था कि उसका अर्थ बार-बार बदला जा रहा है।
चंद्रशेखर के अनुसार, सामाजिक न्याय की राजनीति में केवल नारे पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसी तरह स्वामी प्रसाद मौर्य भी PDA के अर्थ को लेकर अखिलेश यादव पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका आरोप रहा है कि सपा नेतृत्व इस नारे की अलग-अलग व्याख्या करता है। इन बयानों के बाद पिछड़े और दलित समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग विपक्षी दलों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं।
2027 विधानसभा चुनाव से पहले क्यों महत्वपूर्ण है यह विवाद?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। समाजवादी पार्टी लगातार PDA के मुद्दे को अपनी राजनीतिक रणनीति के केंद्र में रख रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 37 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद पार्टी ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के साथ अपने राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
अब लखनऊ में लगे विरोध के बैनरों ने कुछ नए सवाल खड़े किए हैं। विशेष रूप से मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा समुदायों की राजनीतिक भागीदारी के मुद्दे को लेकर चर्चा हो रही है। इन समुदायों का उत्तर प्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक महत्व है।
ऐसे में राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समाजवादी पार्टी इन समुदायों की चिंताओं को किस तरह संबोधित करती है और क्या विरोध के इस अभियान का विस्तार अन्य जिलों में भी होता है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन बैनरों का विधानसभा चुनाव में मतदान के व्यवहार पर क्या असर पड़ेगा।
26 नवंबर को PDA का घोषणा पत्र जारी करेगी समाजवादी पार्टी
इस विवाद के बीच समाजवादी पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर एक महत्वपूर्ण घोषणा भी की है। अखिलेश यादव ने 19 अक्टूबर को घोषणा की थी कि उनकी पार्टी 26 नवंबर 2026 को संविधान दिवस के अवसर पर अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करेगी।
इस घोषणा पत्र को 'सत्ताइस का संकल्प : PDA का प्रणपत्र' नाम दिया गया है। सपा इसे 'जन-मन का मैनिफेस्टो' के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है। इसमें सामाजिक न्याय, संवैधानिक अधिकारों और विभिन्न सामाजिक वर्गों से जुड़े मुद्दों पर पार्टी की योजनाएं सामने आने की उम्मीद है। ऐसे समय में लखनऊ में PDA के नारे पर उठे सवालों का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
खबरों के अनुसार, बैनर अभियान को लेकर समाजवादी पार्टी नेतृत्व की कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, अखिलेश यादव पहले ही स्वामी प्रसाद मौर्य की INDIA गठबंधन में भागीदारी को नकार चुके हैं। अब यह देखना होगा कि सपा नेतृत्व बैनरों में लगाए गए आरोपों पर कोई औपचारिक जवाब देता है या इस विवाद को राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रखता है।
अखिलेश यादव के खिलाफ पहले भी लग चुके हैं विवादित बैनर
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के खिलाफ 'बॉयकॉट सपा' के बैनर लगने का मामला पहली बार सामने नहीं आया है। इससे पहले भी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत कई जिलों में अखिलेश यादव के विरोध में पोस्टर और होर्डिंग लगाए जा चुके हैं। इन पोस्टरों में कभी उनकी राजनीतिक नीतियों, कभी कानून-व्यवस्था तो कभी धार्मिक मुद्दों को लेकर सवाल उठाए गए।
23 अक्टूबर 2026 को भी अखिलेश यादव के खिलाफ उत्तर प्रदेश के करीब 15 जिलों में पोस्टर लगाए गए थे। इनमें लखनऊ, बलिया, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़ और वाराणसी जैसे जिले शामिल थे। पोस्टरों में आजम खान, अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरों के जरिए समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा गया था।
इससे पहले जुलाई 2026 में अयोध्या, मथुरा, बाराबंकी, गोंडा, सीतापुर और लखनऊ में भी अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव को निशाना बनाते हुए विवादित होर्डिंग लगाए गए थे। इन पर धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर सपा नेतृत्व की आलोचना की गई थी।
मई 2026 में लखनऊ के बंगला बाजार और पुरानी जेल रोड पर अखिलेश यादव और आजम खान के खिलाफ पोस्टर लगाए गए थे। इनमें बिजली चोरी से जुड़े आरोप दर्शाए गए थे। हालांकि, पोस्टर लगाने वालों की पहचान स्पष्ट नहीं थी। वहीं, मई 2025 में अखिलेश यादव और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के बीच डीएनए को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ था। उस दौरान भी लखनऊ में अखिलेश यादव को निशाना बनाते हुए पोस्टर सामने आए थे। जुलाई 2025 में डिंपल यादव पर एक मौलाना की विवादित टिप्पणी के बाद अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाने वाले पोस्टर भी लगाए गए थे।
क्या पूरे मौर्य समाज में नाराजगी है? विरोध के दावों पर उठे सवाल
लखनऊ में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के खिलाफ लगाए गए ‘बॉयकॉट सपा’ के बैनरों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। इन बैनरों में मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा समाज की नाराजगी का जिक्र किया गया है। स्वामी प्रसाद मौर्य के कथित अपमान को लेकर विरोध जताते हुए समाजवादी पार्टी के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के नारे पर भी सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह नाराजगी पूरे मौर्य समाज की है या कुछ लोगों और संगठनों तक सीमित है? फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि बैनर लगाने वाले लोग किस संगठन से जुड़े हैं और उन्हें इन समुदायों का कितना व्यापक समर्थन हासिल है। किसी भी समाज की राजनीतिक सोच अलग-अलग क्षेत्रों, स्थानीय नेतृत्व और व्यक्तिगत विचारों के आधार पर भिन्न हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा समुदायों की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में इनके नाम पर सामने आया विरोध राजनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि, कुछ बैनरों के आधार पर पूरे मौर्य समाज को समाजवादी पार्टी से नाराज बताना उचित नहीं होगा। इसके लिए संबंधित सामाजिक संगठनों और समुदाय के प्रतिनिधियों की प्रतिक्रियाएं जानना जरूरी है।
बैनरों से शुरू हुई बहस
लखनऊ में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के बहिष्कार वाले बैनरों ने स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ सपा नेतृत्व के मतभेदों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। यह विवाद अब केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं है। इसके जरिए पिछड़े वर्ग के नेताओं के सम्मान, राजनीतिक हिस्सेदारी और समाजवादी पार्टी के PDA अभियान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही है। अब मुख्य सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी विरोध करने वालों की चिंताओं को संबोधित करेगी और क्या स्वामी प्रसाद मौर्य तथा अखिलेश यादव के बीच राजनीतिक मतभेद और गहराएंगे?




