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बांग्लादेश में हजारों कपड़ा फैक्ट्री मजदूर कम वेतन, बढ़ती महंगाई, नौकरी की असुरक्षा और खराब कामकाजी परिस्थितियों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी वजह न्यूनतम मासिक वेतन बढ़ाने की मांग है।
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LIVE 24 TV | अंतरराष्ट्रीय समाचार | 2 नवंबर 2026 ढाका। बांग्लादेश की राजधानी ढाका और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में एक बार फिर बड़े पैमाने पर मजदूर आंदोलन भड़क उठा है। कपड़ा कारखानों में काम करने वाले हजारों श्रमिक वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर
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सड़कों पर उतर आए हैं। विरोध प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर आगजनी, तोड़फोड़, सड़क जाम और पुलिस के साथ हिंसक झड़पों की घटनाएं सामने आई हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि रविवार, 1 नवंबर को देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में 529 कपड़ा कारखानों का
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उत्पादन प्रभावित हुआ। बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (BGMEA) के अनुसार, इस आंदोलन के कारण लगभग 9.87 लाख मजदूरों का काम प्रभावित हुआ। ढाका के मीरपुर, सावर, आशुलिया, गाजीपुर और मैमनसिंह जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों
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ने प्रदर्शन किए। मजदूरों की सबसे बड़ी मांग न्यूनतम मासिक वेतन 12,500 टका से बढ़ाकर 30,000 टका करना है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती महंगाई के कारण मौजूदा वेतन में परिवार का गुजारा करना मुश्किल हो गया है। प्रदर्शनों के दौरान ढाका के मीरपुर में एक
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पुलिस वाहन को आग लगा दी गई। गाजीपुर और सावर में भी आगजनी की घटनाएं हुईं। हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस, पानी की बौछारों और अन्य भीड़ नियंत्रण उपायों का इस्तेमाल किया। बढ़ते तनाव के बीच प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने आपात बैठक की, जबकि
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सरकार ने मजदूरों की वेतन संबंधी मांगों की समीक्षा के लिए छह सदस्यीय वेतन बोर्ड गठित किया है। सोमवार, 2 नवंबर को कई कारखाने दोबारा खुल गए, लेकिन कुछ औद्योगिक इलाकों में तनाव और प्रदर्शन जारी रहे। आखिर क्यों भड़का मजदूरों का गुस्सा? बांग्लादेश में
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रेडीमेड गारमेंट यानी तैयार कपड़ों का उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस उद्योग में लगभग 40 लाख लोग काम करते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। लेकिन मजदूर संगठनों का कहना है कि उनकी कमाई बढ़ती महंगाई के मुकाबले काफी कम
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है। पिछले कुछ वर्षों में मकान किराया, खाने-पीने की वस्तुओं, परिवहन, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च बढ़ा है। वर्तमान में गारमेंट उद्योग का न्यूनतम मासिक वेतन 12,500 बांग्लादेशी टका है। मजदूर इसे बढ़ाकर 30,000 टका करने की मांग कर रहे हैं। यानी मजदूर
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मौजूदा न्यूनतम वेतन में 140 प्रतिशत की बढ़ोतरी चाहते हैं। श्रमिकों का कहना है कि कपड़ा उद्योग से देश को अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, लेकिन इसका पर्याप्त लाभ उन्हें नहीं मिल रहा। इसी असंतोष के कारण 31 अक्टूबर को शुरू हुए प्रदर्शन 1
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नवंबर को बड़े पैमाने पर फैल गए और 2 नवंबर को भी कई इलाकों में जारी रहे। ढाका के मीरपुर में हिंसा, पुलिस की गाड़ी को लगाई आग ढाका के मीरपुर इलाके में विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। बड़ी संख्या में मजदूर मीरपुर-10, मीरपुर-11 और आसपास की सड़कों पर
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जमा हो गए। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य मार्गों को अवरुद्ध कर दिया, जिससे यातायात बाधित हुआ। कई जगह वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। मीरपुर-11 क्षेत्र में पल्लबी मेट्रो रेल स्टेशन के आसपास एक पुलिस वाहन में आग
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लगाए जाने की घटना सामने आई। आग लगने से सड़क पर धुएं का गुबार फैल गया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई स्थानों पर झड़पें हुईं। पुलिस ने भीड़ को हटाने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। कुछ प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस पर
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ईंट-पत्थर फेंके जाने की भी खबरें हैं। हालांकि हिंसा में शामिल सभी लोगों की पहचान और उनकी भूमिका की जांच अलग विषय है। शांतिपूर्ण वेतन मांगों और हिंसक गतिविधियों को एक ही रूप में नहीं देखा जा सकता। गाजीपुर और सावर में भी आगजनी, कारखानों को बनाया निशाना
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राजधानी ढाका के बाहर गाजीपुर और सावर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी हालात तनावपूर्ण रहे। मजदूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर प्रमुख सड़कों और राजमार्गों पर प्रदर्शन किया। गाजीपुर में कई स्थानों पर आग लगाए जाने की खबरें आईं। इनमें एक कपड़ा कारखाने
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का गोदाम भी शामिल था। सावर में एक गारमेंट फैक्ट्री के सुरक्षा बूथ में आग लगाए जाने की घटना सामने आई। गाजीपुर के कालियाकैर इलाके में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। कुछ स्थानों पर दोनों पक्षों के लोग घायल होने की खबरें भी आईं।
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ढाका-टांगाइल राजमार्ग पर प्रदर्शन के कारण वाहनों की आवाजाही बाधित हुई। इसका असर केवल कारखानों के कामकाज पर नहीं, बल्कि आसपास के व्यापार और दैनिक आवागमन पर भी पड़ा। हिंसा की घटनाओं के बीच पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई गई। सीमा सुरक्षा बल
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बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के जवानों को भी व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाया गया। मजदूरों की मांग सिर्फ वेतन बढ़ाने तक सीमित नहीं बांग्लादेश में प्रदर्शन कर रहे मजदूरों की सबसे प्रमुख मांग न्यूनतम मासिक वेतन 30 हजार टका करने की है। लेकिन कई श्रमिक
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संगठनों ने इसके अतिरिक्त भी कुछ मुद्दे उठाए हैं। मजदूरों ने नौकरी से निकाले गए श्रमिकों की बहाली और श्रमिकों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की प्रथा समाप्त करने की मांग की है। कई श्रमिकों का कहना है कि काम की अनिश्चितता और बढ़ती महंगाई ने उनकी आर्थिक स्थिति
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कमजोर कर दी है। मजदूर संगठनों का तर्क है कि अगर उद्योग का निर्यात लगातार अरबों डॉलर में होता है, तो उसमें काम करने वाले श्रमिकों की आय में भी जीवनयापन की लागत के अनुसार सुधार होना चाहिए। दूसरी ओर, फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि उत्पादन लागत में
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वृद्धि, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा के कारण उद्योग पहले से दबाव में है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बुलाई आपात बैठक बांग्लादेश में मजदूर आंदोलन के हिंसक होने के बाद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने रविवार को
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मंत्रियों और वरिष्ठ सलाहकारों के साथ आपात बैठक की। बैठक में औद्योगिक क्षेत्रों की सुरक्षा, मजदूरों की मांगों और कारखानों में उत्पादन फिर से शुरू कराने पर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि मजदूरों के हितों और जीवन स्तर में सुधार
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को ध्यान में रखते हुए औद्योगिक उत्पादन तथा सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। सरकार ने प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने और काम पर लौटने की अपील की। अधिकारियों को हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं में शामिल लोगों के
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खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए। सरकार के सामने एक तरफ मजदूरों की वेतन संबंधी समस्याओं का समाधान करने और दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े निर्यात उद्योग का कामकाज सामान्य बनाए रखने की चुनौती है। मजदूरों की नाराजगी कम करने के लिए बांग्लादेश
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सरकार ने छह सदस्यीय न्यूनतम वेतन बोर्ड गठित किया है। इस बोर्ड में मजदूरों, फैक्ट्री मालिकों, सरकार और एक स्वतंत्र सदस्य का प्रतिनिधित्व रखा गया है। बोर्ड का उद्देश्य मौजूदा वेतन व्यवस्था की समीक्षा करना और मजदूरों की मांगों पर विचार करना है।
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बांग्लादेश गारमेंट एंड इंडस्ट्रियल वर्कर्स फेडरेशन के महासचिव बाबुल अख्तर भी मजदूर प्रतिनिधि के रूप में बोर्ड से जुड़े हैं। उन्होंने कहा है कि श्रमिकों की मांगों को वेतन बोर्ड के सामने उचित तरीके से रखा जाएगा। सोमवार को मजदूर प्रतिनिधियों ने
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प्रदर्शनकारियों से काम पर लौटने की अपील भी की। साथ ही गिरफ्तार मजदूरों की रिहाई और उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग उठाई। हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि सरकार न्यूनतम वेतन कितना बढ़ाएगी और नई व्यवस्था कब से लागू होगी। हिंसा के पीछे
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राजनीतिक साजिश? सरकार ने लगाए आरोप मजदूर आंदोलन के बीच बांग्लादेश सरकार की ओर से राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी लगाए गए हैं। गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक तत्व मजदूरों के आंदोलन को भड़काने और देश में अस्थिरता पैदा करने की
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कोशिश कर रहे हैं। बांग्लादेश की सरकारी समाचार एजेंसी BSS के अनुसार, पुलिस ने ढाका में अवामी लीग और उससे जुड़े संगठनों के 19 नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को प्रदर्शन भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया है। सरकार ने कुछ कारखाना मालिकों पर भी आंदोलन को
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प्रभावित करने के आरोप लगाए हैं। हालांकि इन राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। गिरफ्तार व्यक्तियों के खिलाफ आरोपों की सत्यता का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा। दूसरी ओर, मजदूरों की वेतन संबंधी मांगों का
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वास्तविक आर्थिक आधार भी है, इसलिए पूरे आंदोलन को केवल राजनीतिक साजिश के रूप में देखना उचित नहीं होगा। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए क्यों बड़ा संकट? बांग्लादेश में कपड़ा कारखानों की बंदी और मजदूरों के हिंसक विरोध प्रदर्शनों ने देश की अर्थव्यवस्था
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के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। बांग्लादेश का रेडीमेड गारमेंट उद्योग देश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यह उद्योग कुल निर्यात आय में 80 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है और लगभग 40 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है। ऐसे में सैकड़ों
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कारखानों में उत्पादन रुकने से देश की आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ने की आशंका है। रिपोर्टों के अनुसार, मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के कारण 529 कारखानों में कामकाज प्रभावित हुआ और लगभग 9.87 लाख श्रमिकों को काम बंद होने की स्थिति का सामना करना
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पड़ा। इसका असर उत्पादन, आपूर्ति व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है। बांग्लादेश दुनिया के प्रमुख कपड़ा निर्यातक देशों में शामिल है। अमेरिका और यूरोपीय देशों की कई बड़ी फैशन कंपनियां बांग्लादेश से कपड़े खरीदती हैं। यदि कारखानों में लंबे
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समय तक उत्पादन बंद रहता है, तो विदेशी कंपनियों के ऑर्डर समय पर पूरे नहीं हो पाएंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय खरीदार भारत, वियतनाम और अन्य देशों की ओर रुख कर सकते हैं। इसके अलावा कपड़ा उद्योग में काम करने वाले लाखों मजदूरों की आजीविका भी दांव पर लगी है।
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उत्पादन बंद रहने से श्रमिकों की आय प्रभावित हो सकती है, जिससे घरेलू बाजार में खरीदारी और उपभोग पर भी असर पड़ेगा। बांग्लादेश पहले से महंगाई, ऊर्जा लागत और विदेशी मुद्रा संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में औद्योगिक अशांति से निवेशकों का
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भरोसा कमजोर होने की आशंका है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती मजदूरों को उचित वेतन दिलाने और उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखने के बीच संतुलन स्थापित करना है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह संकट बांग्लादेश
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के रोजगार, निर्यात और आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकता है। फैक्ट्री मालिकों ने दी 'काम नहीं तो वेतन नहीं' की चेतावनी मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के बीच फैक्ट्री मालिकों ने भी अपनी चिंताएं जताई हैं। BGMEA के अध्यक्ष महमूद हसन खान ने कहा कि सरकार वेतन
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बोर्ड का गठन कर चुकी है और अब मजदूरों को समीक्षा प्रक्रिया आगे बढ़ने देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रदर्शन के कारण कारखानों को फिर बंद करना पड़ा, तो मालिकों के सामने 'नो वर्क, नो पे' यानी काम नहीं तो वेतन नहीं का प्रावधान लागू करने का
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विकल्प रह सकता है। मालिकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और उत्पादन लागत पहले से अधिक है। हालांकि मजदूर संगठनों का तर्क है कि कम वेतन के कारण श्रमिक परिवारों का गुजारा मुश्किल हो रहा है। उनका कहना है कि उद्योग को
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अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से बेहतर कीमतों के लिए बातचीत करनी चाहिए। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मजदूरों की आय में सुधार और उद्योग की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। 2 नवंबर को बांग्लादेश के कई औद्योगिक क्षेत्रों
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में कारखाने दोबारा खोल दिए गए। हालांकि मीरपुर, सावर, आशुलिया और गाजीपुर जैसे इलाकों में पुलिस की मौजूदगी बनी रही और कुछ स्थानों पर मजदूरों का विरोध जारी रहा। गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने कारखाना मालिकों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर स्थिति सामान्य
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बनाने के उपायों पर चर्चा की। सरकार ने कारखाना मालिकों, पुलिस और गृह मंत्रालय के बीच निरंतर संपर्क की व्यवस्था करने का निर्णय लिया है। साथ ही स्थिति की निगरानी के लिए नियंत्रण कक्ष बनाने की योजना भी सामने आई है।इसका उद्देश्य किसी नए विवाद की स्थिति
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में तत्काल बातचीत और कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बांग्लादेश में इस आंदोलन की आगे की दिशा काफी हद तक मजदूरों, सरकार और कारखाना मालिकों के बीच होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगी। यदि वेतन बोर्ड समयबद्ध तरीके से कोई स्वीकार्य समाधान प्रस्तुत करता है, तो
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औद्योगिक क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करने में मदद मिल सकती है। लेकिन अगर मजदूरों को लगता है कि उनकी मांगों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हो रही, तो प्रदर्शन दोबारा तेज हो सकते हैं। दूसरी तरफ लंबे समय तक उत्पादन बाधित रहने से उद्योग और मजदूर दोनों
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को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती वेतन संबंधी विवाद का समाधान निकालने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करने और हिंसा रोकने की है। वेतन की लड़ाई ने बढ़ाई तारिक रहमान सरकार की मुश्किलें बांग्लादेश में
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मजदूरों की न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग ने बड़े औद्योगिक आंदोलन का रूप ले लिया है। 1 नवंबर को 529 कारखानों में उत्पादन प्रभावित हुआ और लगभग 10 लाख श्रमिकों का काम बाधित हुआ। ढाका और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में सड़क जाम, आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस से
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झड़पों के कारण हालात तनावपूर्ण बने रहे। प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार ने वेतन बोर्ड का गठन कर बातचीत की प्रक्रिया शुरू की है। सोमवार को कई कारखानों में काम बहाल होने के बावजूद श्रमिकों की मूल मांगों का समाधान अभी बाकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है
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कि क्या सरकार मजदूरों की 30 हजार टका न्यूनतम वेतन की मांग पर कोई सहमति बना पाएगी, या आने वाले दिनों में बांग्लादेश का यह औद्योगिक संकट और गहराएगा?